आदि पुराण

ईश्वर क्या है?

फंतासी है।

फंतासी क्या है?

ईश्वर है।

हा…हा… कैसे?
जब नहीं था मनुष्य
तब नहीं थे ईश्वर
नहीं था ग्रंथ
नहीं थे शिलालेख
नहीं थी मूर्तियाँ
नहीं उसके पद चिह्न

इससे क्या होता है?

तो क्या मनुष्य के होने के पहले
ईश्वर था?
यदि था
तो मनुष्य के आने के पहले से
अनंत काल के आरंभ से
मनुष्य के आने तक
क्या कर रहे थे ईश्वर?
इतने बड़े काल का
कहाँ है विवरण
ईश्वर को नही पता था?
कि लोग तो पूछेंगे ही?

हा…हा…
ये प्रश्न पूछने की
शायद संभावना नहीं थी
वरना आदमी
लिख ही दिया होता
ईश्वर की ओर से
इसका भी उत्तर
ईश्वर की आदिम लीलाएँ
जो अब तक
नहीं लिखी जा सकी
सोचता हूँ
मैं ही लिख मारूँ
और नाम रख दूँ
आदि पुराण

– सुरेश वाहने

Advertisements

सफल दलाल

 

0 D

जो 

अपनों को

परायों को

सपनें दिखाकर

आँकड़ों में उलझाकर

बेहिचक

करें

हलाल

न देखे

गरीब

न देखे

विवशता

मीठी बातों से

मार-मारकर

उधेड़ ले

खाल

मछली समझकर

चारा डालकर

अचानक फेंक दे

भयंकर

जाल

नोंच ले

खसोट ले

उड़ा ले

अधिक से अधिक

माल

और

अपनी मुट्ठी

कर ले

लाल

वही

सफल दलाल !!!

– सुरेश वाहने

मछली रेगिस्तान में

0-fishवह मछली
तैर रही थी
रेगिस्तान के
अथाह रेतों के भीतर
जहाँ पानी नहीं था
लेकिन तैर रही थी
आँसुओं में
जो झर रहा था
उसकी आँखों से
वह घुल रही थी
पतली हो रही थी
छिल रही थी
मिल रही थी
बह रहा था खून
बह रही थी वह
और उम्र हो गई वाष्पित
बनकर मृगतृष्णा
अब वह मछली
मछली नहीं रही
बन गई रेत
लेकिन
उसके इरादें
टूटे नहीं
उसके इरादें
रूके नहीं
अब भी दिखते हैं
उसके इरादें
उड़ते हुए
कभी इधर
कभी उधर

और
रेत के विशाल गुबार
टीले बनाकर
कर रहे दर्ज
अपनी गवाही

रह-रहकर नागफनी
विलाप करती
शाप देती
रेगिस्तान को

रेगिस्तान को मार गया काठ
हो गया गूँगा
चाँद की तरह!

– सुरेश वाहने

छत्तीसगढ़ी दोहे

(१)
खीसा ल बचाके चलव, सब झन हे बेहाल ।
बेलना चला-चला के, टूथपेस्ट ल निकाल ।।

(२)
मच्छड़ मुक्ति बर राजा, दागिस तोप दन-दन ।
एको मच्छड़ मरिस नहीं, मरगे सवा सौ झन ।।

(३)
मर-मरके कमाबो हम, हिसाब माँगव आप।
टैक्स म छूट पाल्टी बर, काबर करेस बाप।।

(४)
सौ-सौ मुसवा ल खाके, बिलई ह जावय हज।
पतियावव ग मुसवा हो, काहय बिलई सहज।।

(५)
ओकर घर देर हावय, येकर घर अंधेर ।
नेटवर्क के सुध नहीं, कैशलेस के टेर ।।

– सुरेश वाहने

स्त्री

स्त्री
हो सकती है मछली
शोभा बढा़ती
एक्वेरियम में कैद

स्त्री
हो सकती है मछली
नदी के धारा के विरूद्ध
कुशल तैराक

स्त्री
हो सकती है मछली
अथाह सागर के तल पर
पानी को चीरती वीरांगना

स्त्री
हो सकती है मछली
कभी छोटी
कभी बड़ी

लेकिन…
स्त्री नहीं हो सकती
मगरमच्छ
यह असंभव न सही
यह कठिन न सही
पर क्या तब
मगरमच्छ और मछली
दोस्त हो पायेंगे?

यानी
मगरमच्छ का ग्रास बनेंगी
मछली
और मछला भी

यानी मगरमच्छ
हो जायेगा आदमखोर
सबको पता है
आदमखोर को
मार दी जाती है गोली
या फिर
कैद कर ली जाती है
जल्द ही आजीवन

शायद इसीलिए
सब कुछ हो सकने की
संभावनाओ के बावजूद
स्त्री स्त्री होती
और कुछ नहीं ।

– सुरेश वाहने

हाइकु

0sk
मैं मेंहदी हूँ
जिन्हें रचना हो
रचो हाथ में
मैं समय हूँ
जिसने खोया मुझे
रोया बाद में
मैं यादें भी हूँ
कभी खोया भी करो
आधी रात में
कैसा घमंड?
आखिर तू मिलेगा
यहीं खाक में
रेलगाड़ी हूँ
जिन्हें चलना है
चलो साथ में
– सुरेश वाहने

हिरण

0-hiran
शेरों के दंगल से
दहशत फैला जंगल में
हम
न इसके साथ

हम

न उसके साथ
हम
किसी के साथ
कैसे हो सकते हैं?
हम
आखिर ग्रास हैं उनके
उनके साथ होंगे
सिर्फ सियार
हम
हिरण हैं
हिरण के साथ हैं
– सुरेश वाहने